सच जानने की कोशिश
उस बुजुर्ग की बात सुनने के बाद हम सब कुछ देर तक चुप बैठे रहे।
हम सबके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था —
अगर वह आदमी सालों पहले गायब हो गया था… तो हमें चाय किसने दी थी?
उस रात हम सब अपने-अपने घर चले गए,
लेकिन मेरे दिमाग से वह बात बिल्कुल भी नहीं निकल रही थी।
मैं बार-बार उसी सुबह के बारे में सोच रहा था।
कोहरा… सुनसान रास्ता… अचानक दिखाई देने वाली चाय की टपरी…
और वह आदमी…
अगले दिन शाम को हम सब फिर राम मंदिर में मिले।
इस बार हमने तय किया कि
हम उस जगह के बारे में सच्चाई पता करेंगे।
मेरे दोस्त सूरज ने कहा,
"अगर सच में वहाँ कोई रहस्य है… तो हमें पता लगाना चाहिए।"
कुछ दोस्त डर रहे थे,
लेकिन आखिर में हम सब तैयार हो गए।
हमने तय किया कि
अगली सुबह हम फिर उसी रास्ते पर जाएंगे।
उस रात मुझे नींद भी ठीक से नहीं आई।
बार-बार वही सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा था।
सुबह होते ही हम सब फिर रनिंग के बहाने उस रास्ते पर पहुँचे।
इस बार कोहरा पहले जितना नहीं था।
रास्ता भी थोड़ा साफ दिखाई दे रहा था।
हम धीरे-धीरे उसी जगह की तरफ बढ़ रहे थे
जहाँ हमने उस दिन चाय की टपरी देखी थी।
लेकिन जैसे ही हम वहाँ पहुँचे…
हम सब हैरान रह गए।
क्योंकि वहाँ…
कोई चाय की टपरी थी ही नहीं।
वहाँ सिर्फ पुरानी टूटी हुई लकड़ियाँ और जली हुई मिट्टी पड़ी थी,
जैसे बहुत साल पहले वहाँ कुछ बना था… और फिर खत्म हो गया।
हम सब एक-दूसरे को देखने लगे।
और तभी…
मेरे दोस्त आलोक ने जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा —
"रुको… ये देखो…"
हम सबने नीचे देखा।
मिट्टी पर ताज़े पैरों के निशान बने हुए थे…
और वो निशान
सीधे उसी जगह से आ रहे थे जहाँ हम खड़े थे।
लेकिन अजीब बात यह थी कि
वो निशान आगे नहीं जा रहे थे…
बल्कि अचानक वहीं खत्म हो रहे थे। please like and comment karna mat bhuliye hamari aagli kahani ke liye
