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Chapter 1 - chapter 1

नहीं रहना चाहती! तूने मुझे फँसाया था, उल्लू बनाया तूने मुझे! इसलिए मैंने राहुल से मैचअप कर लिया है! आज से यही है मेरा बोयफ़्रेंड!" डिंपल ने ग़ुस्से में कहा।

"अच्छा! तो बेबी यही है तुम्हारा वो बेकार सा एक्स बॉयफ्रेंड?" राहुल ने पूछा और डिंपल के बग़ल में आकर खड़ा हो गया।

फिर उसने लकी के हाथ से थैली उठाई और उसमें से हार्डप्ले का पैकेट निकालकर उसे चिढ़ाने के लिए उसे हवा में लहराने लगा।

"बाप रे! इससे बदकिस्मत इंसान इस दुनिया में और कौन होगा!" राहुल ने उसकी टांग खींचते हुए कहा।

लकी के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। उसने ग़ुस्से से डिंपल को देखा और अपनी हाथों की मुट्ठी भींच ली, फिर वहाँ से निकल गया।

"अबे पैसे तो ले जा! सब कुछ फ़्री ही दे जाएगा क्या!" राहुल ने ज़ोर से ठहाका लगाते हुए कहा, लेकिन लकी बिना उसकी बात सुने ही निकल गया उसके दिमाग़ में डिंपल के कहे शब्द गूँज रहे थे।

उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि डिंपल उसके साथ ऐसा भी कुछ कर सकती थी। जिस इंसान के लिए वो इतना कुछ करना चाह रहा था, उसे उसकी कोई क़दर ही नहीं थी। लकी इतना हताश हो गया था कि बूरी तरह से रोने लगा था। इस बार वो लिफ़्ट से नहीं बल्कि सीढ़ियों से नीचे उतरा और एकएक सीढ़ी उतरने के साथ उसके आंसू आँखों से छलकते जा रहे थे। जब उसकी आवाज़ सुनकर कुछ लोग अपने कमरे से बाहर आए तो लकी ने तुरंत अपने आँसू पोंछे और तेजी वहाँ से भाग गया।

उसे ज़िंदगी में पहली बार प्यार हुआ था और पैसों की कमी की वजह से ना सिर्फ़ उसका प्यार बल्कि उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई थी।

जैसे ही लकी बाहर आया तो उसने देखा की बाहर अंधेरा हो गया था। आसमान में तेज बिजली कड़की और बारिश जो थोड़ी थमी थी एकाएक फिर झमाझम बरसने लगी। ये देख लकी के थमे हुए आंसू एक बार फिर छलक गए। उसका दिल बूरी तरह टूट चुका था लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी भी हो रही थी की आख़िर आज उसे डिंपल का असली चेहरा नज़र आ गया था। वो तो उसके साथ घर बसाने की सोच रहा था लेकिन अच्छा हुआ कि उसने पहले ही उसका घर बर्बाद होने से बचा लिया। लकी को दुख तो बहुत हो रहा था पर उसे ये भी लग रहा था कि आगे चलकर यही दुख उसे ख़ुशी देने वाला था।

लेकिन और एक चीज़ थी जो लकी को परेशान कर रही थी वो थी उसकी माली हालत उसकी जेब इतनी तंग थी कि उसे फटी हुई जेब की पेंट पहनकर घूमना पड़ता था। कभी कभी तो लकी सिर्फ़ रोटी खाकर दिन काट देता था। वो कब से कोशिश कर रहा था कि कोई अच्छा काम पकड़ सके लेकिन उसे कहीं कोई काम देने को राजी नहीं था। उसने टूटे हुए दिल को दिलासा देते हुए मन में सोचा कि डिंपल पर होने वाले खर्चे बच जाने से शायद उसके हालात कुछ सुधर जाएँगे पर फिर भी वो रातों रात रईस तो नहीं हो जाने वाला था।

उसने ऊपर आसमान की ओर देखा और जोर से चिल्लाया, "अगर इतना ही unlucky बनाना था, तो फिर नाम लकी क्यूँ रखा भगवान!"

वो जितनी ज़ोर से चिल्ला सकता था उतनी ज़ोर से चिल्लाया।

उसकी आवाज़ से आसपास खड़े लोग एक बार को डर गए थे। लकी ऊपर ही देख रहा था और उसके आंसू बारिश के पानी के साथ मिल गए थे। जैसे ही वो फूटकर रोने को था तभी उसके फ़ोन पर एक मैसेज आया। जैसे ही लकी ने अपना फ़ोन निकालकर उस मेसेज को पढ़ना शुरू किया तो उसकी आँखें चमक गई। अचानक से उसके आंसू हँसी में बदल गए और वो ज़ोर ज़ोर से वहीं सड़क पर नाचने लगा।

उस मैसेज में लिखा था, "परिवार की रिसर्च और परिवार के निर्णय के हिसाब से, अग्रवाल परिवार का वारिस, लक्ष्मण लाल अग्रवाल उर्फ़ लकी ने ग़रीबी अभ्यास की परीक्षा को पास कर लिया है और आज से ही वो उस ज़मीन और उस जायदाद का मालिक हो जाएगा जो परिवार ने उसके नाम कर रखा था।"

ये कैसा मैसेज था? आख़िर कौन था लकी? क्या थी उसकी असलियत? और वो कैसे रातों रात ही अनलकी से हो गया था, इतना लक

देर में लकी ने अपने फ़ोन में फिर से उस मेसेज को खोलकर देखा, उतनी ही देर में मैनेजर उसके लिए एक चमचमाता हुआ सुप्रीम कार्ड लेकर उसके सामने आ गया था। लेकिन उस कार्ड को देखने के बाद ना जाने क्यूँ मैनेजर को ऐसा लग रहा था की ये कार्ड लकी की सम्पत्ति के आगे कुछ भी नहीं था। फिर भी मैनेजर इसमें कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वो जानता था कि उसके पास इस ब्रांच में इससे बड़ा और कोई कार्ड नहीं था। इसलिए फ़िलहाल तो वो लकी को यही दे सकता था। उसने उस कार्ड पर लकी का पूरा नाम लक्ष्मण लाल अग्रवाल गुदवा लिया था।

"लीजिए सर आपका कार्ड। पासवर्ड वग़ैरह सब आपको ईमेल पर मिल जाएगा।" शशिकांत ने मुस्कुराते हुए कहा और वो लकी के सामने हाथ बांधकर खड़ा हो गया।

इधर लकी ने उस कार्ड को उलट-पलटकर देखा और फिर अपनी जगह से खड़ा होकर वो बाहर निकलने लगा। शशिकांत का मन तो यही कर रहा था की वो उसे दरवाज़े तक छोड़ने जाए, लेकिन उसकी ड्यूटी इसी ऑफ़िस में थी और वो किसी को बाहर छोड़ने नहीं जा सकता था। फिर भी वो लकी के लिए दरवाज़ा खोलने के लिए आगे आ गया था।

इधर यासमिन अपने केबिन में अपना सिर पकड़े हुए बैठी थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था की आख़िर अंदर चल क्या रहा था। एक पल को तो उसे लगा की लकी पागल नहीं बल्कि बदमाश था कोई और उसने शशिकांत को बंदी बना लिया था। लेकिन जब वो लकी के लिए कार्ड लाने के लिए अपने दफ़्तर से बाहर आया तो यासमिन को लगा की कुछ गड़बड़ नहीं हुई थी।

"फिर ये इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे है?" उसने अपने आप से पूछा।

शशिकांत को सुरक्षित देख बैंक के बाक़ी लोग भी दरवाज़े पर से पीछे हट गए थे। वैसे भी उसे देखते ही सब लोग अपनी- अपनी जगह पर वापिस दौड़े चले जाते थे। शशिकांत का ख़ौफ़ ही ऐसा था की उसकी आँखों की झलक भर से खड़ा कर्मचारी जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता था।

लेकिन एक बार शशिकांत के बाहर आने के बाद वो दोबारा बाहर नहीं आया था और ना ही लकी कमरे से बाहर आया था। इधर यासमिन परेशान हुए जा रही थी। वो जानती थी कि अगर कुछ भी गड़बड़ होती तो सबसे पहले उसकी नौकरी जाने वाली थी। उसने बड़ी मुश्किल से और मेहनत करके इस नौकरी को हासिल किया था और वो किसी पागल की वजह से इसे अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। जैसे ही परेशान यासमिन ने अपनी नज़र उठाकर फिर से उस कमरे की ओर देखा तो पाया कि लकी बहुत ही आराम से उस कमरे से बाहर निकलकर दरवाज़े की ओर बढ़ता चला जा रहा था।

"ओए! रुको! तुम इस तरह से नहीं जा सकते!" यासमिन जोर से चिल्लाई और भागते हुए लकी के पास चली गई।

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ज़बरदस्ती हमारे V.I.P रूम में घुसे चले जाने की?" यासमिन ने गुस्से से पूछा।

उसका मन तो यही कर रहा था की वो अभी लकी का गिरेबान पकड़कर उसे जकझोर दे लेकिन उसने अपने आपको रोक रखा था।

"मैने पहले भी तो कहा था, मैं यहाँ सिर्फ़ अपना पैसा लेने के लिए आया था।" लकी ने कहा और मुस्कुराने लगा।

यासमिन ने देखा की उसके हाथ में एक सुप्रीम कार्ड था और वो उसकी उँगलीयों के बीच चमक रहा था। यासमिन के दिमाग़ में आया की लकी ने ये कार्ड अंदर से चुरा लिया था और इससे पहले की वो यहाँ से चोरी करके भागता, यासमिन जोर से चिल्लाई,"सिक्यरिटी! सिक्यरिटी!" उसकी आवाज़ को सुनते ही दो बंदूक़ वाले गार्ड भागे- भागे यासमिन के पास आए।

"ये चोरी करके भाग रहा था! पकड़ो इसे!" लकी ने जब यासमिन के मुहः से ये बात सुनी तो उसके कान खड़े हो गए। इससे पहले की वो वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग पाता, सिक्यरिटी वालों ने उसे धर दबोच लिया था और उसकी जेब टटोलने लगे थे। इधर यासमिन ने देखा की उस सुप्रीम कार्ड पर उसने अपना नाम भी गुदवा लिया था।

"तुम्हारी इतनी हिम्मत की तुमने शशिकांत सर को डराकर इसपर अपना नाम भी लिखवा लिया। इसकी जेब चेक करो!" यासमिन ने गुस्से से कहा।

दोनों में से एक गार्ड लकी की जेब टटोलने लगा था। लकी को समझ में नहीं आ आ रहा था की आख़िर ये लड़की उसे समझ क्या रही थी। अगर उसे इसके खाते या इसकी सम्पत्ति या सिर्फ़ इसके परिवार के बारे में भी पता चल जाता तो भी यासमिन उसके पैरों में गिर जाती। इससे पहले की लकी अपनी सफ़ाई में खुद कुछ कह पाता एक गार्ड बोला, "मैडम! इसकी जेब में तो कुछ नहीं है, बल्कि फटी हुई जेब है इसकी।"

किन और एक चीज़ थी जो लकी को परेशान कर रही थी वो थी उसकी माली हालत उसकी जेब इतनी तंग थी कि उसे फटी हुई जेब की पेंट पहनकर घूमना पड़ता था। कभी कभी तो लकी सिर्फ़ रोटी खाकर दिन काट देता था। वो कब से कोशिश कर रहा था कि कोई अच्छा काम पकड़ सके लेकिन उसे कहीं कोई काम देने को राजी नहीं था। उसने टूटे हुए दिल को दिलासा देते हुए मन में सोचा कि डिंपल पर होने वाले खर्चे बच जाने से शायद उसके हालात कुछ सुधर जाएँगे पर फिर भी वो रातों रात रईस तो नहीं हो जाने वाला था।

उसने ऊपर आसमान की ओर देखा और जोर से चिल्लाया, "अगर इतना ही unlucky बनाना था, तो फिर नाम लकी क्यूँ रखा भगवान!"

वो जितनी ज़ोर से चिल्ला सकता था उतनी ज़ोर से चिल्लाया।

उसकी आवाज़ से आसपास खड़े लोग एक बार को डर गए थे। लकी ऊपर ही देख रहा था और उसके आंसू बारिश के पानी के साथ मिल गए थे। जैसे ही वो फूटकर रोने को था तभी उसके फ़ोन पर एक मैसेज आया। जैसे ही लकी ने अपना फ़ोन निकालकर उस मेसेज को पढ़ना शुरू किया तो उसकी आँखें चमक गई। अचानक से उसके आंसू हँसी में बदल गए और वो ज़ोर ज़ोर से वहीं सड़क पर नाचने लगा।

उस मैसेज में लिखा था, "परिवार की रिसर्च और परिवार के निर्णय के हिसाब से, अग्रवाल परिवार का वारिस, लक्ष्मण लाल अग्रवाल उर्फ़ लकी ने ग़रीबी अभ्यास की परीक्षा को पास कर लिया है और आज से ही वो उस ज़मीन और उस जायदाद का मालिक हो जाएगा जो परिव

और एक चीज़ थी जो लकी को परेशान कर रही थी वो थी उसकी माली हालत उसकी जेब इतनी तंग थी कि उसे फटी हुई जेब की पेंट पहनकर घूमना पड़ता था। कभी कभी तो लकी सिर्फ़ रोटी खाकर दिन काट देता था। वो कब से कोशिश कर रहा था कि कोई अच्छा काम पकड़ सके लेकिन उसे कहीं कोई काम देने को राजी नहीं था। उसने टूटे हुए दिल को दिलासा देते हुए मन में सोचा कि डिंपल पर होने वाले खर्चे बच जाने से शायद उसके हालात कुछ सुधर जाएँगे पर फिर भी वो रातों रात रईस तो नहीं हो जाने वाला था।

उसने ऊपर आसमान की ओर देखा और जोर से चिल्लाया, "अगर इतना ही unlucky बनाना था, तो फिर नाम लकी क्यूँ रखा भगवान!"

वो जितनी ज़ोर से चिल्ला सकता था उतनी ज़ोर से चिल्लाया।

उसकी आवाज़ से आसपास खड़े लोग एक बार को डर गए थे। लकी ऊपर ही देख रहा था और उसके आंसू बारिश के पानी के साथ मिल गए थे। जैसे ही वो फूटकर रोने को था तभी उसके फ़ोन पर एक मैसेज आया। जैसे ही लकी ने अपना फ़ोन निकालकर उस मेसेज को पढ़ना शुरू किया तो उसकी आँखें चमक गई। अचानक से उसके आंसू हँसी में बदल गए और वो ज़ोर ज़ोर से वहीं सड़क पर नाचने लगा।

उस मैसेज में लिखा था, "परिवार की रिसर्च और परिवार के निर्णय के हिसाब से, अग्रवाल परिवार का वारिस, लक्ष्मण लाल अग्रवाल उर्फ़ लकी ने ग़रीबी अभ्यास की परीक्षा को पास कर लिया है और आज से ही वो उस ज़मीन और उस जायदाद का मालिक हो जाएगा जो परिवार ने उसके नाम कर रखा था।"