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Chapter 2 - आखिरी चिट्ठी एपिसोड 2

बस स्टैंड पर लोगों की भीड़ अभी भी उस बूढ़े आदमी के शव के चारों तरफ जमा थी। पुलिस को खबर दी जा चुकी थी, लेकिन आरव की नज़र बार-बार अपनी हथेली में रखी उस जंग लगी चाबी पर जा रही थी।

वह चाबी किसी साधारण ताले की नहीं लग रही थी। उसके ऊपर एक अजीब सा निशान बना था—एक आधा चाँद और उसके बीच में एक खुली हुई आँख।

"ये आखिर है क्या?" उसने खुद से कहा।

तभी उसके मोबाइल पर वही अनजान नंबर फिर चमका।

"अगर ज़िंदा रहना चाहते हो तो चाबी किसी को मत दिखाना। हर नज़र तुम्हारी दुश्मन है।"

मैसेज पढ़ते ही उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

वह भीड़ से निकलकर अपने कमरे की तरफ चल पड़ा।

कमरे में पहुँचते ही उसने दरवाज़ा बंद किया और चाबी को मेज़ पर रख दिया।

जैसे ही उसने उसे छोड़ा, कमरे की लाइट एक बार झपकी।

फिर दूसरी बार।

और अचानक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

बाहर तेज़ बारिश और गरजती बिजली की आवाज़ गूँज रही थी।

आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

उसकी रोशनी सीधे मेज़ पर पड़ी...

लेकिन चाबी वहाँ नहीं थी।

"अभी तो यहीं रखी थी..."

वह घबरा गया।

उसने पूरा कमरा तलाशा।

अचानक पीछे से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आई।

टक... टक... टक...

आरव पलटा।

कमरा खाली था।

लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी-अभी बारिश से भीगकर अंदर आया हो।

वह उन निशानों का पीछा करने लगा।

निशान सीधे उसकी अलमारी तक गए और वहीं खत्म हो गए।

काँपते हाथों से उसने अलमारी खोली।

अंदर वही चाबी रखी थी।

लेकिन इस बार उसके साथ एक नया लिफाफा भी पड़ा था।

लिफाफे पर लिखा था—

"दूसरी चिट्ठी"

आरव को बूढ़े आदमी की बात याद आई—

"उसे पढ़ना मत..."

उसने लिफाफा उठाया।

कुछ सेकंड तक उसे घूरता रहा।

फिर धीरे-धीरे उसे वापस रखने लगा।

उसी समय कमरे में किसी लड़की के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

"बचाओ..."

आवाज़ इतनी साफ थी कि आरव डर गया।

उसने चारों तरफ देखा।

कोई नहीं था।

रोने की आवाज़ फिर आई—

"मुझे बचाओ..."

अबकी बार आवाज़ लिफाफे के अंदर से आ रही थी।

आरव अपने डर पर काबू नहीं रख पाया।

उसने लिफाफा खोल दिया।

अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

उस पर लिखा था—

"आज रात ठीक 1 बजे पुराने श्मशान घाट मत जाना... अगर गए तो वापस नहीं लौटोगे।"

जैसे ही उसने आखिरी शब्द पढ़ा, पूरे पन्ने पर लाल रंग फैलने लगा।

कुछ ही सेकंड में शब्द बदल गए।

अब उस पर लिखा था—

"तुमने चेतावनी पढ़ ली है। अब फैसला तुम्हारा नहीं रहा।"

अचानक खिड़की अपने आप खुल गई।

तेज़ हवा कमरे में भर गई।

मेज़ पर रखा कैलेंडर उड़कर दीवार से टकराया।

मोबाइल अपने आप बजने लगा।

स्क्रीन पर वही अनजान नंबर था।

आरव ने काँपते हाथों से कॉल उठाई।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ साँसों की आवाज़ आई।

फिर एक भारी आवाज़ सुनाई दी—

"चाबी को बचाकर रखना... क्योंकि उसके पीछे मौत चल रही है।"

कॉल कट गई।

रात के बारह बजकर पचपन मिनट।

आरव ने तय कर लिया कि वह कहीं नहीं जाएगा।

वह दरवाज़ा बंद करके बिस्तर पर बैठ गया।

एक बजने में सिर्फ पाँच मिनट बाकी थे।

अचानक बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

ठक... ठक... ठक...

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ सेकंड बाद फिर आवाज़ आई।

इस बार पहले से ज़्यादा तेज़।

ठक... ठक... ठक...

फिर एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी—

"कृपया दरवाज़ा खोलिए... मेरी मदद कीजिए..."

आरव का मन पिघलने लगा।

लेकिन तभी उसकी नज़र दूसरी चिट्ठी पर पड़ी।

उसने खुद को रोक लिया।

कुछ पल बाद आवाज़ बंद हो गई।

उसने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी उसके मोबाइल पर एक वीडियो अपने आप चलने लगा।

वीडियो में वही दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

कैमरा बाहर की तरफ था।

दरवाज़े के सामने कोई लड़की नहीं खड़ी थी।

वहाँ एक काली परछाईं थी...

जिसका चेहरा बिल्कुल नहीं था।

वह धीरे-धीरे अपना सिर कैमरे की तरफ घुमाने लगी।

और फिर स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन दिखाई दी—

"तुमने दरवाज़ा नहीं खोला... इसलिए अब हम अंदर आ रहे हैं।"

उसी क्षण कमरे का दरवाज़ा बिना किसी आवाज़ के अपने आप खुलने लगा...

और अंधेरे में दो चमकती हुई लाल आँखें दिखाई दीं।

क्रमशः...

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