आखिरी बार…
उस दिन के बाद मैंने फैसला कर लिया था कि
मैं उस रास्ते पर कभी वापस नहीं जाऊँगा।
लेकिन अजीब बात यह थी कि
उस घटना के बाद से मुझे हर रात एक ही सपना आने लगा।
सपने में मैं उसी सुनसान सड़क पर खड़ा होता था।
चारों तरफ घना कोहरा होता था।
और दूर…
वही चाय की टपरी दिखाई देती थी।
टपरी के अंदर वही आदमी खड़ा होता था।
वह मुझे देखता…
और धीरे से हाथ उठाकर इशारा करता —
"इधर आओ…"
मैं डर के मारे उसके पास नहीं जाता था।
लेकिन हर रात सपना थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा।
एक रात मैंने देखा कि
टपरी के पास सिर्फ वह आदमी नहीं था…
बल्कि वहाँ कुछ और परछाइयाँ भी खड़ी थीं।
मैं डर के मारे नींद से जाग गया।
अगले दिन मैंने यह बात अपने दोस्तों को बताई।
मेरे दोस्त सूरज ने कहा,
"शायद यह सब उस दिन की घटना की वजह से हो रहा है।"
लेकिन मेरे दोस्त आलोक ने धीरे से कहा —
"अगर यह सपना नहीं हुआ तो…?"
उसकी बात सुनकर हम सब चुप हो गए।
क्योंकि हमारे मन में भी कहीं न कहीं यह डर था कि
शायद वह जगह हमें फिर से बुला रही थी।
और फिर एक दिन…
जब मैं शाम को घर लौट रहा था…
मुझे अचानक वही कपों की टकराने की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा…
और जो मैंने देखा…
उसे देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
क्योंकि इस बार वह चाय की टपरी उस सुनसान रास्ते पर नहीं…
बल्कि मेरे घर के पास वाली सड़क पर खड़ी थी। 👻
और टपरी के अंदर खड़ा वह आदमी
धीरे से मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था…
जैसे वह कह रहा हो —
"अब तुम मुझसे बच नहीं सकते…" kahani.pasand aaye to please comment karo
