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The Book of Kalpa-Briksha HINDI VERSON

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Chapter 1 - The Boy Get A Mysterious Old Book

राजखुवा गाँव की संकरी गलियों में धूल उड़ती थी। आसमान पर धुंधली धूप पसरी थी, और इसी धूप में एक दुबला-पतला किशोर, बिनम बरुआ, अपने बस्ते को ढोता हुआ चुपचाप घर लौट रहा था।

उसकी आँखों में थकी हुई उदासी थी, मन में टूटी हुई उम्मीदें। हर रोज़ की तरह आज भी स्कूल के बच्चों ने उसे तंग किया था। मार-पीट, तानों और अपमान का बोझ उसके मासूम कंधों पर चढ़ चुका था।

"क्या मेरी ज़िंदगी बस यूँ ही गुमनाम तकलीफों में घिसती रहेगी?"

उसके भीतर का दर्द आँखों के किनारों तक उमड़ आया था, मगर वह लड़का अपने आँसुओं को निगल गया।

तभी, उसकी नज़र सड़क किनारे पड़ी एक धूलभरी पुरानी किताब पर पड़ी।

किताब पर मोटे अक्षरों में लिखा था: "कलपवृक्ष"।

बिनम ठिठक गया।

"किसी ने इसे यहाँ क्यों छोड़ दिया होगा?"

उसने सोचा।

"जो भी हो, घर ले जाकर देखूँगा। शायद मन बहल जाए।"

यह सोचकर उसने किताब को अपने बैग में डाल लिया और तेज़ कदमों से घर की ओर बढ़ चला।

घर पहुँचते ही बिनम सीधे अपने छोटे से कमरे में घुसा। माँ तो काम पर गई थीं — वह एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका थीं और मुश्किल से दस हजार रुपये महीना कमाती थीं।

बिनम ने बैग को स्टडी टेबल पर पटका और फ्रेश होने चला गया। जब उसने ठंडे पानी से चेहरा धोने की कोशिश की,額 पर हल्की सी जलन उठी।

आज भी स्कूल में लगी चोटें उसे चुपचाप चीख रही थीं।

"कम से कम बाल लंबे हैं... किसी ने नहीं देखा..."

वह बुदबुदाया।

रात का अंधेरा गहराने लगा था।

कमरे में एक पीली सी ट्यूबलाइट टिमटिमा रही थी।

बिनम ने धीरे से "कलपवृक्ष" को खोला।

पहला पृष्ठ पलटते ही चमकते अक्षरों में लिखा था:

"जिसके भी हाथ यह ग्रंथ लगेगा, उसकी चार इच्छाएँ पूरी होंगी।"

बिनम हँस पड़ा,

"हाहा... चार इच्छाएँ? कोई बच्चा समझा है क्या मुझे? पागलों वाली बातें हैं ये।"

लेकिन भीतर कहीं एक अनजानी उम्मीद भी जाग उठी थी।

कई बार तो कहानियों में भी ऐसा ही होता है — और कौन जानता है, शायद इस बार उसके साथ भी कोई चमत्कार घट जाए?

थोड़ी देर सोचने के बाद उसने किताब में अपनी चार इच्छाएँ लिख दीं:

---

1. एक अद्भुत, सर्वशक्तिमान किताब, जीसमे मे अपनी हर एक ईच्छा पुरी कर सकू।

2. एक अजेय देवदूत (एंजेल), जो पूरे मल्टीवर्स में सर्वोच्च और मेरी हर इच्छा को पूर्ण करने में सक्षम हो।

3. नेक्रोमांसर का सर्वशक्तिमान भगवान बनना, जो ब्रह्मांडों को अपनी मुट्ठी में बाँध सके।

4. इच्छाएँ पूरी होते ही "कलपवृक्ष" ग्रंथ का नाश हो जाना।

जैसे ही बिनम ने आखिरी इच्छा पूरी की,

कमरे में अचानक एक भीषण कंपन होने लगा।

अंधेरे से एक रहस्यमयी, डार्क डिवाइन आभा उठी और उसे चारों ओर से घेरने लगी।

उससे पहले कि बिनम कुछ समझ पाता, वह एक अनजान आयाम में खिंच गया — शून्यता के Realm में।

चारों ओर गहरा अंधकार था।

सन्नाटा ऐसा कि खुद की साँसों की आवाज़ भी डरा रही थी।

"यह... कहाँ आ गया मैं?"

बिनम ने काँपती आवाज़ में कहा।

तभी, आकाश से एक दिव्य स्वर गूंजा:

"स्वागत है, बिनम बरुआ। अब तुम इस मल्टीवर्स में अजेय, अटूट और परम शक्तिशाली हो। तुम्हारी मात्र 1% शक्ति से संपूर्ण ब्रह्मांड नष्ट हो सकता है या एक नया ब्रह्मांड रचा जा सकता है। आज से तुम 'The Lord of All Necromancers' हो।"

बिनम के शरीर में एक झटका सा लगा।

भयानक दर्द ने उसे घेर लिया। उसकी हड्डियाँ, उसकी नसें, उसकी आत्मा तक जैसे फिर से ढल रही थी।

वह दर्द सह न सका और अचेत हो गया।

जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, वह अपने कमरे में ही था — लेकिन अब सब कुछ अलग था।

उसका शरीर शक्ति से भरपूर था, जैसे हर नस में बिजली दौड़ रही हो।

उसने अपनी मुठ्ठी भींची और मुस्कुराया:

"मुझे लगता है कि मैं... अब अपने एक हि Punch से आकाशगंगाएँ तोड़ सकता हूँ।"

तभी एक और चमत्कार घटा।

उसके सामने एक दिव्य प्रकाश में एक देवदूत प्रकट हुआ — दो चमकते पंखों वाला, सिर पर मंडल के साथ। उसका पूरा शरीर दिव्यता से बना था।

बिनम ने चौंकते हुए पूछा:

"क्या तुम वही एंजेल हो जिसे मैंने माँगा था?"

एंजेल ने विनम्रता से सिर झुकाया:

"जी मेरे स्वामी। मैं आपकी इच्छा का साकार रूप हूँ। आपकी हर इच्छा मेरी आज्ञा होगी।"

बिनम मुस्कुराया।

"तुम्हारा नाम क्या है?"

एंजेल बोला:

"स्वामी, मेरा कोई नाम नहीं है। आप जो चाहें, वह नाम दे सकते हैं। और यह रहा आपका वह पुस्तक, जिसे आपने माँगा था।"

देवदूत ने अपने हाथों से एक चमचमाती किताब प्रस्तुत की — वह किताब जो अब बिनम कि हर एक ईच्चा पुरी करने वाली थी।

बिनाम:

"ओह, तो ये वही किताब है जिससे मैं अनगिनत इच्छाएँ मांग सकता हूँ… क्या बात है! अब तो मैं इस सामान्य सी दुनिया में सबसे शक्तिशाली बन गया हूँ,"

वो मन ही मन मुस्कुराते हुए सोचता है।

तभी वो एंजेल कहता है:

"माफ कीजिएगा मेरे प्रभु, ये कहने के लिए, लेकिन हमारे अलावा भी इस दुनिया में कुछ लोग हैं—बहुत ही कम संख्या में सही, परंतु वे जादुई शक्तियों का प्रयोग करना जानते हैं।"

बिनाम (आश्चर्य से):

"क्या… पृथ्वी पर भी जादुई शक्तियों वाले लोग हैं? जहां तो अब तक मैजिक केवल किताबों, फिक्शन कहानियों और ऐनिमे में ही देखा गया है… और जहाँ विज्ञान को ही सच माना जाता है? मुझे यकीन नहीं हो रहा… ज़रा विस्तार से बताओ।"

वो एंजेल:

"जी मेरे प्रभु, आप इसे इस तरह समझ सकते हैं कि आप जिस दुनिया में रहते हैं, वहाँ आमतौर पर विज्ञान को ही यथार्थ माना जाता है। लेकिन कुछ विशेष कारणों की वजह से कुछ लोगों ने अपनी जादुई शक्तियों को अवेकन कर लिया है। इसका मूल कारण हैं—मैजिकल गेट्स या डंजन्स। कुछ गुप्त संस्थाएँ हैं जहाँ ये अवेकन हुए इंसान काम करते हैं। वे डंजन्स को साफ़ करते हैं—मतलब वहाँ के राक्षसों और जादुई जीवों को मारते हैं और उन डंजन्स से मिलने वाले मैजिकल क्रिस्टल्स को खनन करते हैं। इन्हीं से वे अपने लिए जादुई हथियार बनाते हैं, जैसे—तलवारें, डैगर्स, शील्ड, गॉंटलेट्स, आर्मर, और माना प्यूरिफायर सीरम (पोटियन) आदि।"

बिनाम (हैरानी से):

"क्या..! ये क्या कह रहे हो? कुछ इंसान ऐसे हैं जो जादुई शक्तियाँ चला सकते हैं!? और कुछ गुप्त संगठन जो इन डंजन्स का शिकार करते हैं… जिसमें जादुई राक्षस होते हैं!? लेकिन आज तक आम लोगों को इसके बारे में क्यों नहीं पता चला? और तुम्हें ये सब कैसे पता?"

वो एंजेल:

"मेरे प्रभु, जब आपकी इच्छा के बल पर मैं अस्तित्व में आया, तो मैंने आपकी सुरक्षा के लिए एक बार ही अपने शक्तियों से पूरे यूनिवर्स को स्कैन कर लिया था। तभी मुझे पता चला कि इस 'अर्थ' नामक ग्रह पर कुछ मनुष्य जादुई शक्तियाँ इस्तेमाल करना जानते हैं, लेकिन वो शक्तियाँ बहुत ही निम्न स्तर की होती हैं। वैसे भी, मैं किसी के ऑरा या पावर प्रेशर को देखकर तुरंत समझ सकता हूँ कि वह कितना शक्तिशाली है।"

बिनाम (उत्साहित होकर):

"वाऊ… तुम तो कितने कूल और पॉवरफुल हो! एक ही बार में पूरा यूनिवर्स स्कैन कर लिया! भाई साहब, तुम्हारी शक्तियाँ तो नेक्स्ट लेवल हैं!"

वो एंजेल (झुकते हुए):

"आपकी तारीफ का धन्यवाद, मेरे प्रभु। लेकिन मैं आपके सामने कुछ भी नहीं हूँ।"

बिनाम (मन ही मन सोचते हुए):

"हाह, वैसे भी मैं इतना शक्तिशाली हूँ कि अपनी सिर्फ 1% शक्ति से पूरा मल्टीवर्स नष्ट कर सकता हूँ। और ये जादुई शक्तियाँ रखने वाले इंसान अगर मुझे हराने या मुझसे लड़ने भी आएंगे, तो शायद ही मेरे सामने टिक पाएँगे। तो इन सब बातों को लेकर मुझे ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए।

...और हाँ! मैं तो इसे नाम देना ही भूल गया... क्या नाम दूँ... उHmm... हां! ये नाम परफेक्ट रहेगा!"

बिनाम (एंजेल से):

"अरे, इन सब बातों में तो मैं भूल ही गया कि मुझे तुम्हें एक नाम भी देना है। अब से तुम्हारा नाम होगा—इंद्रजीत।"

इंद्रजीत (मुस्कुराते हुए):

"मुझे इतना सुंदर नाम देने के लिए धन्यवाद, मेरे प्रभु। मुझे ये नाम बहुत ही पसंद आया।"